मंगलवार, 13 सितंबर 2011

भारत को 'इंडिया' बनाने की साजिश

- 14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष
- मानसिक गुलामी की तरह है अंग्रेजी
भोपाल।
अंग्रेजी के बिना दुनिया नहीं चल सकती यह लोगों में बहुत ब़ड़ा
भ्रम है। दरअसल, अंग्रेजी प़ढ़े-लिखे लोगों के दिमाग में कुछ इस तरह घर कर
गई है कि वह मानसिक रूप से उसके गुलाम हो गए हैं। हिन्दी की उपेक्षा या
हिन्दी से दूरी बनने का मतलब है अपनी ज़ड़ों से दूर होना। जैसे-जैसे हम
अपनी हिन्दी रूपी मूल ज़ड़ से दूर होते जाएंगे, विकास रूपी पे़ड़ ज्यादा
दिनों तक नहीं टिक पाएगा। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार एवं 'हम भारतीय'
अभियान (राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) के राष्ट्रीय संयोजक कैलाशचंद्र पंत
का।
अंग्रेजी को मानसिक गुलामी का हवाला देते हुए श्री पंत कहते हैं कि सबसे
ब़ड़ी कमजोरी तो यह है कि हमारे देश में एक ताकत ऐसी है जो भारत को
'इंडिया' बनाना चाहती है। बात चाहे भाषा की हो, बाजारवाद की हो,
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की या फिर शिक्षा पद्धति की। हम अपनी बुनियादी
आवश्यकताओं की भी उपेक्षा कर रहे हैं। अंग्रेजी को ढाल बनाकर जिस तरह
भारतीय सोच, भारतीय मानसिकता और भारतीयता को खत्म करने की साजिश रची जा
रही है, इस बात से हम वाकिफ ही नहीं हैं और आंख मूंदे उस रास्ते की ओर
ब़ढ़ रहे हैं जहां एक दिन हमारी पहचान ही खत्म हो जाएगी कि हम भारतीय भी
हैं और हमारी कोई अपनी भाषा भी है।
हम अपनी ज़ड़ों से जु़ड़ें रहें
श्री पंत कहते हैं कि हिन्दी हमारी पहचान रही है और हिन्दी से ही हमने
विकास के सोपान तय किए हैं। इसलिए यह हमारे लिए प्राणवायु की तरह है,
जहां से हम प्राणवायु पा रहे हैं उसे कैसे भूल सकते हैं। इसलिए आज जो लोग
यह समझ रहे हैं कि अंग्रेजी विकास और उन्नति की भाषा है वह भ्रमित हैं और
उन्हें अपनी ज़ड़ों से जु़ड़े रहना चाहिए।
बाजार का सहारा भी बन रही हिन्दी
हिन्दी को बहुराष्ट्रीय कंपनियां किस तरह हथियार बनाकर भारत में घुसपैठ
कर रही हैं इसका उदाहरण देते हुए श्री पंत कहते हैं कि आज कंपनियां अपने
उत्पाद बेचने के लिए अंग्रेजी के साथ हिन्दी भी अपना रही हैं। 'ठंडा मतलब
कोकाकोला' विज्ञापन की यह लाइन यह साबित करती है कि भारत में माल बेचने
के लिए हिन्दी को अपनाना प़ड़ेगा।
शिक्षा के माध्यम तक सीमित रहे अंग्रेजी
श्री पंत कहते हैं कि हिन्दी को भाषा का माध्यम बनाया जाए और अंग्रेजी
मात्र शिक्षा के माध्यम तक ही सीमित रहे। स्कूलों में अंग्रेजी की
अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह वैकल्पिक विषय के रूप में हो। आज
अभिभावकों एवं विद्यार्थियों को भी यह समझना होगा कि हिन्दी में भी
भविष्य सुरक्षित है, यह महज भ्रम जैसा है कि बिना अंग्रेजी प़ढ़े अच्छी या
उच्च नौकरी नहीं मिल सकती।

1 टिप्पणी:

  1. अंग्रेजी जानने या सीखने का मलब यह नही कि हिंदी ना सीखो या उसे भुला दो । अपनी तो जानो ही दूसरों की भी सीखो तभी आप हर स्थिति में लाभान्वित होंगे ।

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