शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

केरवा में धूल खा रहे शैलचित्र


- देखरेख व संरक्षण के अभाव में अस्तित्व पर संकट
- केरवा पर रिसर्च कर रहीं अर्चना मिश्रा की रिपोर्ट से सामने आए कई तथ्य
भोपाल।
राजधानी से महज दस किलोमीटर दूर केरवा डेम स्थित ब़ड़ी शिला में मौजूद मध्य पाषण एवं ताम्र पाषण काल के ऐतिहासिक शैलचित्र देखरेख के अभाव में धूल खा रहे हैं। ब़ड़ी शिला रसूलिया व चीचली नाका के बीच स्थित है जहां ब़ड़ी संख्या में हजारों साल पुराने शैलचित्र बने हुए हैं। इनके संरक्षण की ओर न तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मंडल का ध्यान है और न ही राज्य पुरातत्व विभाग को इसकी चिंता है। ऐसे में यह शैलचित्र धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं और इनके विलुप्त होने का संकट भी गहराने लगा है। इतिहासकारों के अनुसार इन शैलचित्रों से उस काल के इतिहास को समझने में मदद मिल सकती है। इन शैलचित्रों में पशु, पक्षी, पशु शिकार एवं पशु को भगाते हुए मानव के चित्र अंकित हैं। इसके साथ ही प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण भी इन शैलचित्रों में नजर आ रहा है।
पत्थरों से बनाए गए हैं शैलचित्र
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भोपाल के राज्य परियोजना अधिकारी एवं वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता नारायण व्यास की मानें तो यहां गेरूरंग के शैलचित्र फेसर पत्थर से बनाए गए हैं। तत्कालीन मानव ने प्रकृति को जिस रूप में देखा, उसी का अंकन इन शैलचित्रों में किया है।
संरक्षण की दरकार
पुरात्ववेत्ता श्री व्यास कहते हैं कि इस स्थल का संरक्षण इतिहास व पर्यटन दोनों ही लिहाज से जरूरी है। इन शैलचित्रों का संरक्षण बहुत जरूरी है, इस क्षेत्र की राक पेंटिंग्स संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रही हैं। लोगों द्वारा छे़ड़छा़ड़ किए जाने से इनका वास्तविक स्वरूप बिग़ड़ते जा रहा है।
दौलतपुर में दुर्लभ प्रतिमाओं पर संकट
केरवा डेम से ही सटे ग्राम दौलतपुर में हजारों साल पुरानी पुरातत्व महत्व की अनेक दुर्लभ प्रतिमाएं भी संरक्षण के अभाव में खेतों में प़ड़ी हैं, लेकिन इस ओर भी प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। सदियों पुरानी पुरातत्व महत्व की इन दुर्लभ प्रतिमाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। बताया जाता है कि यहां पहले दौलतपुर गांव बसा हुआ था, जहां आदिवासी निवास करते थे। अब यहां इनके खेत हैं।
शोध में सामने आ रहे कई तथ्य
वैशाली नगर निवासी श्रीमती अर्चना मिश्रा केरवा जलाशय संरक्षण एवं ईको टूरिज्म विषय पर भोज विश्वविद्यालय से शोध कर रही हैं। श्रीमती मिश्रा ने अब तक अपने शोध में अनेक बिंदुओं एवं तथ्यों को शामिल किया है। उनमें शैलचित्र संरक्षण एवं पुरातत्व महत्व की धरोहरें भी शामिल हैं। साथ ही उन्हें यह भी सुझाया है कि यहां स्थित मौत का कुआं को यदि वैज्ञानिक तरीके से इसकी गहराई का अंदाजा लगाकर इसे संरक्षित कर दिया जाए तो इसमें डूबकर मरने वालों को बचाया जा सकता है। इसी तरह उन्होंने उल्लेख किया है कि यहां के पहुंच मार्ग को पक्का करने के साथ ही टूरिज्म के लिहाज से विकसित कर इसे विकसित किया जा सकता है। इससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। वहीं यहां की साफ-सफाई व्यवस्था के भी उन्होंने कुछ उपाय सुझाए हैं।
इनका कहना है
यहां के शैलचित्रों को पुरातत्व विभाग ने अपनी सर्वे सूची में शामिल कर लिया है। विभाग की ओर से जल्द ही यहां का जायजा लिया जाएगा। इनके संरक्षण की दिशा में भी उचित कदम उठाए जाएंगे।
-डीके माथुर, पुरातत्ववेत्ता, संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय