शनिवार, 27 नवंबर 2010

भारत में पानी से जुड़े मुद्दे

भारत में जल के दो मुख्य स्रोत हैं – वर्षा और हिमालय के ग्लेशियरों का हिम-पिघलाव। भारत में वार्षिक वर्षा 1170 मिलीमीटर होती है, जिस से यह संसार के सब से अधिक वर्षा वाले देशों में आता है। परन्तु, यहाँ एक ऋतु से दूसरी ऋतु में, और एक जगह से दूसरी जगह पर, होने वाली वर्षा में बहुत अधिक अन्तर हो जाता है। जहाँ एक सिरे पर उत्तरपूर्व में चेरापूँजी है, जहाँ हर साल 11000 मिलीमीटर बौछार होती है, वहीं दूसरे सिरे पर पश्चिम में जैसलमेर जैसी जगहें हैं जहाँ मुश्किल से 200 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है। राजस्थान के लोगों को यह यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि गुजरात में इस मानसून की बाढ़ में 2000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ या फिर कि हिमाचल की सतलज नदी की बाँध से हज़ारों लोग बेघर हो गये या यह कि हाल की बहुवर्षा से मुंबई का जनजीवन ही अस्तव्यस्त हो गया।

शहरी दरिद्र के लिये शुद्ध पेयजल अभी भी स्वप्न मात्र है। हालांकि बर्फ व ग्लेशियर ताजे पानी के इतने अच्छे उत्पादक नहीं हैं, पर वे इसे बांटने के अच्छे साधन हैं व जरुरत के समय पानी देते हैं, जैसे कि गर्मी में। भारत में 80 प्रतिशत नदियों का प्रवाह गर्मियों के जून से लेकर सितम्बर तक के चार महीनों मे होता है जबकि गर्मी व उमस से भरी समुद्री हवा उत्तर पूर्व से अंदर की ओर आती है (दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम)। पानी की कमी भारत में बड़ी तेजी से भयानक रूप लेती जा रही है। विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार, जब जनसंख्या 2025 में बढ़कर 140 करोड़ हो जाएगी, पानी की बढ़ी हुई जरुरत को पूरा करने के लिए देश की सभी जल स्त्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा।

बढ़ती आबादी का दबाव, आर्थिक विकास और नाकारा सरकारी नीतियों ने जल स्त्रोतों के अत्याधिक प्रयोग तथा प्रदूषण को बढ़ावा दिया है। पुनर्भरण से दुगनी दर पर ज़मीनी पानी बाहर निकाला जा रहा है जिससे कि जलस्तर हर साल 1 से 3 मीटर नीचे गिर जाता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की बीस बड़ी नदियों में से पाँच का नदी बेसिन पानी की कमी के मानक 1000 घन मीटर प्रति वर्ष से कम है और अगले तीन दशकों में इस में पाँच और नदी बेसिन भी जूड़ेंगे।

जल प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है व जल के उपलब्ध साधनों पर और अधिक दबाव डालती है। जल मंत्रालय के अनुसार, भारत का 70% सतह जल व बढ़ते हूए जमीनी जल के भंडार जैविक, व जहरीले रसायनों से प्रदूषित हैं। वर्ल्ड वॉटर इंस्टिट्यूट के अनुसार गंगा नदी, जो कि अनेकों भारतीयों का मुख्य जल स्त्रोत है, में हर मिनट 11 लाख लीटर गंदा नाले का पानी गिराया जाता है। यूनेस्को द्वारा दी गई विश्व जल विकास रिपोर्ट में भारतीय पानी को दुनिया के सबसे प्रदूषित पानी में तीसरे स्थान पर रखा गया है।

हरित क्रांति

हरित क्रांति में तीन मुख्य कारक थे जिन्होंने भारत को अन्न निर्भर देश से दुनिया के सबसे बड़े कृषक देशों में बदल दिया
• कृषि योग्य भूमि में लगातार विस्तार
• चालू कृषि भूमि में दोहरी फसलें – जिस से कि हर साल एक की जगह दो बार उपज की कटाई होती थी
• आनुवंशिक विज्ञान द्वारा बेहतर बीजों का प्रयोग
हरित क्रांति से रिकार्ड तोड़ अन्न उत्पादन हुआ व प्रति यूनिट उपज भी बढ़ी। लेकिन इस से पर्यावरण पर बुरा असर भी पड़ा। कृषि-रसायनों पर आधारित खरपतवार नाशकों के प्रयोग ने आसपास के वातावरण व मानव स्वास्थ्य पर भी असर डाला है। सींचित भूमि के बढ़ावे से जमीन की लवणता में भी वृद्धि हुई है।

जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जिनमें सम्मिलित हैं – घरेलू सीवेज, कृषि एवं औद्योगिक अपशिष्ट। साठ- सत्तर के दशक की “हरित क्रांति” ने ढेरों पर्यावरणीय मुद्दों को जन्म दिया (देखें बॉक्सः हरित क्रांति)। कृषि कार्यों में बेतहाशा इस्तेमाल किए जा रहे कीटनाशकों तथा कृत्रिम खादों ने जल में घुल मिलकर जलचरों के जीवन तक पहुँच बना ली है तथा जल को उपयोग हेतु अयोग्य बना दिया है।

शहरी क्षेत्रों में जल प्रदूषण का प्रमुख कारण है नालियों का मलमूत्र युक्त गंदा पानी तथा उद्योगों का रसायन युक्त उत्सर्जन जो बह-बह कर नदियों में मिलता रहता है। हर साल करीब 5 करोड़ घन मीटर गैर-उपचारित शहरी नालों का गंदा पानी इन नदियों में बहाया जाता है जिससे भारत की सभी चौदह नदी तंत्र भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं। इसी तरह, औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा उत्सर्जित 55 अरब घन मीटर प्रदूषित जल में से 6.85 करोड़ घन मीटर स्थानीय नदियों में, बिना किसी पूर्व उपचार के, सीधे सीधे बहा दिया जाता है।

भारत के 80 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू जल प्रदाय तथा 45 प्रतिशत क्षेत्रों में कृषि कार्य हेतु भूगर्भ जल ही इस्तेमाल में आता है। भूगर्भ जल पर यह भारी-भरकम निर्भरता इसके प्राकृतिक स्रोतों को तेज़ी से ख़त्म कर रही है। राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश तथा दक्षिणी राज्यों में भूगर्भ जल स्तर में तेज़ी से गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत अभी अभूतपूर्व आर्थिक उत्थान के दौर से गुजर रहा है जो जल संकट को और भी गहरा करेगा। जैसे जैसे ग्रामीणों का पलायन शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ता जाएगा, घरेलू तथा उद्योगों की बढ़ती जरूरतों की वजह से जल स्रोतों पर और भी अधिक भार पड़ता जाएगा।


संघर्ष
जल संकट के कारण साझा जल स्रोतों पर विवाद और संघर्ष पैदा होने की आशंका निर्मूल नहीं है। कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों के बीच कावेरी जल विवाद इसका अप्रतिम उदाहरण है। दोनों ही राज्य सिंचाई हेतु कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं। मानसून अगर देरी से आता है या अवर्षा की स्थिति निर्मित होती है तो नदी के जल के उपयोग के लिए हर बार विवाद की स्थिति बन जाती है। यह विवाद स्थानीय कृषकों के विस्थापन से और अधिक तीव्र एवं जटिल हो गया है जो जीवनयापन के लिए कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं।

कृषि उपज के अस्वस्थ तौर तरीक़ों तथा प्रभावी-पारंपरिक वर्षा जल संग्रहण तंत्र के बेजा इस्तेमाल के कारण जल के लिए संघर्ष तीव्रतर होता जा रहा है। क्षुद्र वाणिज्यिक लाभों के लिए तंजावूर डेल्टा स्थित तमिलनाड़ु के बड़े किसान धान की तीन तीन फसलें लेते हैं जिसके पैदावार के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। कर्नाटक में मंद्या के किसान गन्ने की खेती करते हैं – जो एक कैश क्रॉप है पर जिसके लिए भी अतिरिक्त जल की आवश्यकता होती है।

हाल ही में पंजाब सरकार अपने उस वादे से मुकर गई जो व्यास नदी के जल को हरियाणा और राजस्थान के बीच साझा करने के लिए सतलज यमुना लिंक बनाया जाने के लिए दिया गया था। हालाकि हरियाणा के तटवर्ती इलाकों में व्यास नदी नहीं बहती है, परंतु यह नदी जल समझौता दरअसल 1976 में हरियाणा के पंजाब अलग होने से पहले का है, लिहाजा हरियाणा का भी इस पर हक है। पर, तब से ही पंजाब अपने गहन कृषि उपयोग के लिए उस जल पर अपना दावा जताता रहा है।

भारत तथा विश्व में अनेक जगहों पर कई नदियाँ दो या अधिक देशों में से होकर बहती हैं। इन नदियों के जल सर्वत्र विवादों से घिरे रहे हैं कि किस देश का कितना हक बनता है। आज की महती आवश्यकता यह है कि कृषि को तर्कसंगत बनाया जाए, जल वितरण न्याय संगत तरीके से किया जाए तथा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस जल प्रबंधन नीति लागू की जाए।


बहस निजीकरण की

जैसे जैसे जल संरक्षण की जरूरतें बढ़ती जाएगी, वैसे वैसे नीति निर्धारकों तथा उद्योगों के बीच निजीकरण पर बहसें नया रूप लेती रहेंगी। आज के विश्व में जहाँ व्यक्ति और समुदाय जल के लिए अपनी गांठ से खर्च कर रहा है, वहीं कृषि तथा उद्योगों को जल के लिए सिंचाई के लिए नहरों और टैक्स छूट इत्यादि के जरिए आर्थिक सहायता मुहैया किए जा रहे हैं। ऊपर से, शहरी क्षेत्रों की सार्वजनिक जल वितरण प्रणालियाँ बढ़ती जरूरतों, भ्रष्टाचार, जल चोरी और ढहते आधारिक संरचना के चलते असफल होती जा रही हैं।

पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक

दक्षिण अमेरिका के बोलिविया में जलवितरण का निजीकरण करने का नतीजा निकला पानी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, पानी पहुँच से परे हो गया। कोचाबंबा में जलवितरण के निजीकरण का ठेका बेकटेल नामक कंपनी को मिला। बेकटेल ने तुरंत कीमतें दोगुनी कर दीं और शुल्क आधारित परमिट के द्वारा घरों में वर्षाजल के संचयन पर भी रोक लगा दी। कंपनी के इन मनमाने कदमों को व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ा और अंततः बेकटेल को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद बेकटेल ने बोलिविआई सरकार पर ढाई करोड़ डालर का दावा ठोंक दिया, जो कंपनी का कथित विशुद्ध मुनाफा होता यदि उसे काम करने दिया जाता। जलसंसाधनों के निजीकरण की बहस जल को उपभोक्ता सामग्री बनाने के मुद्दे पर केंद्रित है और एक सीधी विचारधारा पर आधारित हैः यदि जल संचयन समय की पुकार है तो जल का मूल्य अदा करने की मजबूरी जलसंचयन को बढावा ही देगी। लेकिन बहस इतनी सीधी भी नही है। पहले तो, जलसंचयन से गरीब व्यक्ति, जो कि आहार श्रँखला के सिरे पर होते हैं, और अधिक जलसंचय करने को मजबूर होगा क्योकि पहले ही उसकी पानी तक पहुँच कम है और वह पानी का अधिक मूल्य वहन भी नही कर सकता। पानी का निजीकरण एकाधिकार को बढावा देगी क्योकि ढाँचागत लागत की वसूली में जल कंपनियों को समय लगेगा और इस दौरान उसके जल वितरण पर निवारक अधिकार रहेंगे। यह एकाधिकार कंपनियों को ग्राहकों से पानी की बढी कीमतें लेने की भी इजाज़त दे देगा (देखें बॉक्सः पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक)।

ऐसी हालत में जब कि पानी की कीमत समुदाय द्वारा ही वहन की जानी है, क्या निजी संस्थानों को पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन से लाभार्जन की अनुमति देनी चाहिए? तेजी से फैलते वैश्वीकरण में जल का व्यवसायीकरण उसे उन लोगों से छीन लेगा जो कीमत वहन नही कर सकते।


नदियो का युगमन – चमत्कार या मृगमरीचिका?

पिछले कुछ वर्षों में नदियों को जोड़ने की योजना को खासा समर्थन मिला है। भारत में 37 नदियों को तीस कड़ियों, दर्जनों बाँधों और हजारों मील लंबी नहरों द्वारा जोड़ना 10,000 करोड़ रूपये का एक भागीरथ प्रयास होगा। इस योजना के मुख्य उद्देश्य हैं:

• 340 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई
• ग्रामीण, शहरी और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिये पेयजल।
• जलविद्युत जनरेटरों द्वारा 34000 मेगावाट का उत्पादन।
• नदीयों के नेटवर्क पर अन्तर्देशीय परिवहन
• पर्यावरण सुधार और वनीकरण का विकास
• रोजगार सृजन
• राष्ट्रीय एकता
यद्यपि इनमें कुछ उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं पर जनता एवं गैरसरकारी संगठनों द्वारा कुछ सवालिया निशान भी लगाये गये हैं। भाजपा सर्मथित एन.डी.ए सरकार द्वारा प्रारंभ की गई इस परियोजना का कॉग्रेस सर्मथित यू.पी.ए सरकार के नेतृत्व मे क्या हश्र होता है यह भी अस्पष्ट है। सरकारी दावा है कि नदियों को जोड़ने वाली आठ नहरों के तकनीकी औचित्य अध्ययन पूरे कर लिए गए हैं, फिर भी इन रिपोर्टों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे दस्तावेज़ों तक पहुँच न हो तो स्वतन्त्र संगठनों द्वारा सरकार के दावों की पुष्टि कठिन हो जाती है। उदाहरणतः यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना से उत्पन्न कितनी ऊर्जा खुद परियोजना को चलाने में खर्च होगी ताकि पानी को अधिक ऊँचाई तक उठाया जाए। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या रिसती नहरों को ठीक करने और सिंचाई की क्षमता को सुधारने जैसे वैकल्पिक समाधानों को भी मद्दे नज़र रखा जा रहा है अथवा नहीं।

क्या बाँध एक समाधान हैं?

बीसवीं सदी गवाह रहा ढेरों बड़े बाँधों के निर्माण का। आज विश्व में करीब 48000 बाँध हैं जो बढती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ती कर रहे हैं। संप्रति भारत व चीन विश्व के बड़े बाँध निर्माताओं में शामिल हैं। पर विरले ही ऐसे शोध किये गये जिससे यह पता लगे कि क्या बाँध उन उद्देश्यों की पूर्ती कर भी रहे हैं या नहीं, जिनके लिए उनका निर्माण हुआ।

पिछले दशक में वर्ल्ड कमिशन आन डैम्स (बाँध पर वैश्विक आयोग), जिसमें उद्योगपति, अभियंता, नीति निर्धारक और गैरसरकारी संगठन शामिल होते हैं, द्वारा बाँधो की लागत और उनसे लाभ के मूल्याकँन पर शोध किया गया। उनके शोध से यह साबित हुआ कि भले ही फायदे हुए हों, पर बाँधों के निर्माण कि लागत उनसे होने वालो लाभों से कहीं ज्यादा है। आयोग की सलाह थी कि बाँधों का निर्माण विकल्पहीनता की स्थिति में ही करना चाहिए।

बहुत से आदिवासी, किसान और मछुआरे नदियों के किनारों पर रहते हैं और अपनी जीविका के लिए नदियों पर निर्भर रहते हैं। अनुमान है कि भारत में 1950 से बने बाँधों के कारण पहले ही 2 करोड़ लोग विस्थापित हो गए हैं। बाँधों की आयु 30 से 50 साल रहती है। आजकल पश्चिम में पर्यावरण को हुई हानि के चलते बाँधों को तोड़ा जा रहा है। बाँधों के निर्माण से जंगल कट गए हैं, हज़ारों ऐसे वनप्राणियों और वृक्षों, जो बाढ़ को रोकने और पानी को ज़मीन में सोखने में मदद करते, का सफाया हो गया है। प्रसिद्ध भाखड़ा नांगल परियोजना के हाल के विश्लेषण से पता चला है कि इस बाँध से मिले पानी से पंजाब की सिंचाई की मांग की केवल 10% पूर्ति हुई है, और भूमिगत जल का घटाव राज्य में खतरनाक गति से जारी है।

प्रस्तावित जुड़ाव राज्यों के बीच बेहतर सहयोग की मांग करता है। परन्तु कई राज्यों ने जुड़ाव योजना को समर्थन देने से मना कर दिया है, क्योंकि उन्हें दूसरे राज्यों के साथ पानी बाँटना पड़ेगा। नदियों की घाटियाँ अन्तर्राष्ट्रीय जल निकाय हैं और उन पर अन्तर्राष्ट्रीय जल सन्धियाँ लागू होती हैं। भारत और उसके पड़ोसियों के बीच पानी के समुचित विभाजन पर कोई सहमति नहीं है।

विश्वव्यापी जल समस्याओं में निपुण सान्द्रा पोस्टेल के अनुसार, जल संरक्षण और वर्तमान संसाधनों का सक्षम प्रयोग आर्थिक और पर्यावरण-संबन्धी दृष्टि से, बाँध बनाने और पानी के वैकल्पिक स्रोत खोजने की अपेक्षा अधिक प्रभावी है। नदियों के पारस्परिक जुड़ाव और अन्य वैकल्पिक समाधानों के लाभ और लागत पर सार्वजनिक चर्चा को बहुत अधिक महत्ता दी जानी चाहिए, इस से पहले कि ज़्यादा देर हो जाए।


समाधान

वर्षाजल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) से राजस्थान के अलवर जिले में पिछले तीन साल से सूखे के प्रकोप से निजात पा रखी है।जहाँ चेरापूँजी, जिसे दुनिया के सब से वर्षायुक्त स्थान के रुप में जाना जाता है, जल की कमी से लगातार जूझ रहा है, राजस्थान का अलवर ज़िला, जहाँ वार्षिक वर्षा मात्र 300 मिलीमीटर होती है, असफल मानसून के रहते भी तीन साल से जल की दृष्टि से आत्मनिर्भर रहा है। यह तभी संभव हो पाया जब ऐसे जोहड़ बनाए गए और ठीक किये गए, जिन में मानसून के दौरान बारिश का पानी जमा किया जाता है, ताकि साल भर पानी दस्तियाब रहे। पानी के प्रयोग का नियन्त्रण सामुदायिक निर्णयों द्वारा किया जाता है और ऐसे कार्य वर्जित होते हैं जिन से जल-संवर्धन को हानि पहुँचती है, जैसे पशुओं को अत्यधिक चराना। जल संकट सिर पर होने के कारण ग्रामीण समुदाय ऐसे समाधानों की ओर रुख कर रहे हैं जो पारंपरिक रूप से भारत और अन्य स्थानों में प्रयोग होते रहे हैं। महाराष्ट्र में रालेगाँव सिद्धि से लेकर राजस्थान के अलवर ज़िले में और तमिलनाड़ के कई इलाकों में छोटे बाँध और तालाब ठीक किये जा रहे हैं ताकि स्थानीय जल समस्या को हल किया जाए।

जल संरक्षण के दस साधारण नियम

• हर दिन एक ऐसा काम करने का प्रयास करें जिससे जल बचाया जा सके। फिक्र न करें अगर यह कम है, हर बूँद की कीमत है। आप का कदम बदलाव ला सकता है।
• पानी उतना ही प्रयोग करें जितना ज़रूरत हो, जैसे कि दाढ़ी बनाते या ब्रश करते वक्त नल बंद कर दें।
• कोशिश करें कि आपके घर के अंदर व बाहर कहीं से पानी का रिसाव नहीं हो रहा हो।
• सब्ज़ी, दाल, चावल को धोने में प्रयुक्त पानी फेंके नहीं। इसे फर्श साफ करने या पेड़ों को पानी देने के काम में लाया जा सकता है।
• अपनी गाड़ी धोते वक्त पाइप की जगह बाल्टी का प्रयोग करें।
• अपने समुदाय में समूह बनाये जो जल संरक्षण और वर्षा जल हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहन देता हो। अपने इलाके के लिये साधारण वर्षा जल हार्वेस्टिंग प्रणाली बनायें। छत के जल का संचय कर व छान कर घरेलू प्रयोग के लिये शुद्ध पानी पाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिये यह जालस्थल देखें।
• अपने शौचालय में लो-फ्लश या ड्यूअल फ्लश जैसे फ्लश उपकरण लगवा कर आप पानी बचा सकते हैं।
• नहाते वक्त शॉवर की जगह बाल्टी व मग का इस्तेमाल करें।
• अगर वाशिंग मशीन का प्रयोग करना ही है तो मशीन फुल लोड पर चलायें।
• दिन के सबसे ठंडे समय यानि प्रातः या सांयकाल अपने बगीचे में पानी डालें।

स्थानीय सरकारों ने, विशेषकर तमिलनाड़ और कर्नाटक में, शहरों की लगभग सभी वाणिज्यिक एवं घरेलू इमारतों में वर्षा का जल एकत्रित करने के लिए सार्वजनिक नीति बनाने पर ज़ोर दिया है, जैसा चेन्नई ने कर दिखाया है। परन्तु बढ़ती आबादी और पानी की खपत के कारण शहरी समुदाय की बढ़ती प्यास बुझाने में ये असफल रहे हैं। अन्य समाधान भी हैं, जिन्हें भारत के सन्दर्भ में कुछ सुधारा जा सकता है। जैसे कि कनाडा, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया व भारत ने अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए “ग्रे वॉटर रिसाइक्लिंग” का प्रयोग करना शुरू किया है।

देश में पानी की सबसे ज्यादा बरबादी कृषि क्षेत्र में होती है। जहाँ विश्व में कृषि दक्षता का प्रतिशत 70 प्रतिशत है वहीं भारत में यह केवल 35 प्रतिशत है। शेष पानी बह जाने, वाष्प में बदल जाने या वॉटर लॉगिंग के कारण बरबाद हो जाता है। सिंचाई तकनीक में सुधार लाने के लिये काफी आधुनिकीकरण हुआ है। ड्रिप तकनीक उनमें से एक है। सरकार को कम लागत वाली आधुनिक सिंचाई तरकीबों की खोज के लिये धन लगाकर गरीब तथा मार्जीनल किसानों की सहायता करनी चाहिये जो इन मंहगी तरकीबों का खर्च नहीं उठा सकते।

पानी की बढ़ती कमी के कारण जल संरक्षण को आज की जरूरत बना दिया है। घरेलू, कृषि तथा ओद्योगिक स्तर पर जलसंरक्षण को बढ़ावा देना चाहिये। इसका मतलब यही है कि हमें अपनी जीवन शैली तथा क्रॉप पैटर्न (फसल चक्र) का पुनरीक्षण करना होगा ताकि पानी की मांग की को सफलता पूर्वक पूरा किया जा सके।

विभिन्न प्रयोगकर्ताओं में पानी के उपयोग की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं का निर्धारण आवश्यक हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार घरेलू तथा सफाई संबंधी जरूरतों के लिये प्रति व्यक्ति प्रति दिन पचास लीटर पानी की आवश्यक होती है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या के बावजूद यह आवश्यकता विश्व में उपलब्ध ताजे पानी की मात्रा का केवल 1.5 प्रतिशत है। अत: न्यूनतम मूलभूत जरूरत को पूरा करने राजनैतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये नीति निर्धारकों, सामूहिक तथा कृषि/उद्योग क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं से अलाहदा परिप्रेक्ष्य की जरूरत है। क्या हम इस चुनौती का सामना कर सकते है?

6 टिप्‍पणियां:

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    पूरा पढ़ने के लिए :-
    http://baasvoice.blogspot.com/2010/11/blog-post_29.html

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  4. बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  5. " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" की तरफ से आप, आपके परिवार तथा इष्टमित्रो को होली की हार्दिक शुभकामना. यह मंच आपका स्वागत करता है, आप अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच

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