शनिवार, 27 नवंबर 2010

2025 तक विश्व की आधी आबादी भीषण जलसंकट झेलने पर विवश होगी। क्या है इस संकट की जड़?

जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है, इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी। इस संकट की जड़ क्या है? इस से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि “सबके लिये पानी” का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके? प्रस्तुत है इन सारे विषयों और जल से जुड़े अन्य मुद्दों पर विहंगम दृष्टि डालता यह आलेख।

राजस्थान के शुष्क इलाकों में महिलाओं को रोज़ाना घरेलू ज़रूरत का पानी लाने के लिये तकरीबन 4 घंटे चलना पड़ता है।

• दिसंबर 2003 में कर्नाटक ने तमिलनाडू को ज्यादा पानी देने के उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जतायी।
• तमिलनाडू में समय पर पानी नहीं मिल पाने के कारण फसलें काल कवलित होती रहीं।
• मधुरंथगम के किसानों का विरोध है कि चैन्नई की ज़रूरतो को पूरा करने के लिये उनके जलाशय से पानी क्यों लिया जा रहा है।
• भारत व बांग्लादेश में सेंकड़ो लोग, आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायनों से प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं, वहीं बोतलबंद पानी का 800 करोड़ रुपयों का बाज़ार फलफूल रहा है।
• प्लाचीमाडा, केरल में पंचायत विरोध जताती है कोका कोला के संयंत्र पर, जो उनके प्राकृतिक संसाधनों का नाश कर रहा है, पर न्यायालय आदेश देता है कि कोक अपना उत्पादन शुरु कर सकता है और ग्रामसभा को लाईसेंस देना ही पड़ेगा।
यह सारे तथ्य भारत में दिन प्रतिदिन विकराल रूप धरते जलसंकट का रूप दिखाते हैं।
जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है। युनेस्को जल को मानवाधिकार का दर्जा देती है। पर आज दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास पेयजल उपलब्ध नहीं है। लगभग और 290 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य-रक्षा सुविधायें मुहैय्या नहीं हैं। पानी लाने की जुगत में लड़कियाँ पाठशाला जाने की सोचें भी तो कैसे!अनुमान है कि सन् 2015 तक विश्व की आधी आबादी विकट जल संकट झेलने को विवश होगी। इस संकट की जड़ क्या है? क्या घटते जल प्रदाय से जल संकट पैदा हो रहा है? इस संकट से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि सहस्त्राब्दी के अंत तक सबके लिये पानी का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके?
शुद्ध पेयजल पूर्ति व जुड़े खतरे

पृथ्वी पर मौजूद जलसंपदा का सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही शुद्ध जल का स्त्रोत है। इसका भी दो तिहाई हिस्सा ध्रुवीय हिमपिंडो, बर्फ की तहों और गहरे भूमिगत संग्रहों में कैद हैं। तो पूरी जलसंपदा के सिर्फ 0.5 प्रतिशत तक ही मानव की सहज पहुँच है। यह शुद्ध जलापूर्ति विभिन्न रुपों में अभिगम्य है। जल चक्र जल का एक से अन्य रूप में रूपांतरण करता है (देखें बॉक्सः जल चक्र), जिससे सतही तथा भूमिगत जल स्त्रोतों की वर्षा तथा पिघलते हिमपिंडो से प्राप्त जल से पुनर्भरण होता है। पर यह जानना ज़रूरी है कि अगर वर्षाजल तथा सतही जल की सही तरीके से हार्वेस्टिंग न हो तो अधिकांश जल भूगर्भीय एक्यूफर्स (पानी का संचय करने वाली पत्थरों और मिट्टी की भूगर्भीय सतह) का पुनर्भरण करने के बजाय समुद्र के हत्थे चढ़ जायेगा।

स्वच्छ जल की आपूर्ति तकरीबन 7400 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यानि लगभग 4500 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन होती है। इससे आपको ऐसा लगता होगा कि यह तो ज़रूरत से भी ज्यादा है, पर लगातार बढ़ती मांग और घटती सप्लाई से वैश्विक जल प्रबंधन में कई परेशानियाँ हैं। ताज़े पानी के संसाधन विश्व में असमान रूप से फैले हुए हैं। उदाहरणतः एशिया में, जहाँ संसार की 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, विश्व के केवल 36 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इस असमान विभाजन से जल प्रबन्धन पर दो तरह से असर होता है: पहला, प्रति व्यक्ति जल की मात्रा घट जाती है, जिस का अर्थ है पानी की तंगी और कुछ इलाकों में संकट की स्थिति; और दूसरा, भूमिगत जल के दुरुपयोग से भविष्य में नवीकरण योग्य पानी तक हमारी पहुंच को और हानि पहुंचती है।
विश्व भर के जल का 80 प्रतिशत कृषि के लिए प्रयुक्ती होता है। परन्तु सिंचाई के लिए प्रयोग होने वाले जल का 60 प्रतिशत व्यर्थ जाता है, रिसती नहरों, वाष्पीकरण और कुप्रबन्धन के कारण। कृषि में प्रयोग हुए खाद और कीटनाशकों के अवशेष भी जल स्रोतों को दूषित करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं।
जल चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे शुद्ध जल का सतत पुनर्भरण होती रहती है।
• महासागर का जल वाश्पिकृत (evaporate) हो वाष्प का रूप धरता है।
• वाष्प का द्रविभवन (condensation) होता है और ये बादल का रूप धर लेते हैं।
• ठंडी ज़मीनी हवा के संपर्क में आकर जल पातन क्रिया (precipitation) के नतीजतन बारिश या हिम के रूप में गिरती है।
• वर्षा जल
o पौधों और वृक्षों के द्वारा प्रस्वादन से वाष्प में बदलता है।
o ज़मीन मे समाता है और भूमिगत जल, नदियों तथा महासागर की ओर बहने लगता है।
o पृथ्वी की सतह पर जलधारा के रूप मे बह कर महासागर में मिल जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक, मानवीय और कृषि-सम्बन्धित जूठन के रूप में 20 लाख टन गन्दगी और विषाक्त जल हमारे पानी में मिल जाता है। इस गन्दगी और विषाक्त पदार्थों से ताज़े जल की उपलब्धि 58 प्रतिशत तक घटने का डर है। इस के अतिरिक्त प्रदूषण से होने वाले नाटकीय जलवायु परिवर्तन से भी जल की उपलब्धि 20 प्रतिशत घटने की आशंका है। पानी के बढ़ते उपभोग और बढ़ते शहरीकरण के कारण पानी का संकट और भीषण होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के परिणामस्वरूप भूमिगत जल का भी संसार के अनेक शहरों में ज़रूरत से ज़्यादा दोहन हो रहा है (देखें बॉक्सः एक धंसता शहर)। भूमिगत जल के दुरुपयोग से भूमि भी सिकुड़ रही है और हम जल संग्रहण के सबसे सस्ते पात्र से भी हाथ धोने जा रहे हैं। जलस्रोतों के संरक्षण और शुद्धिकरण में वन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रदूषण करने वाले तत्वों को नदियों तक पहुँचने से रोकते हैं, बाढ़ रोकते हैं और भूमिगत जल के पुनर्भरण में वृद्धि करते हैं।

अनुमान है कि न्यूयॉर्क नगर में वितरित जल का 25 प्रतिशत भाग जंगल ही साफ करते हैं। शहरीकरण द्वारा वनों के कटाव और वेटलैंड्स (जलयुक्त भूमिक्षेत्र) के हनन से पानी के भटकने के रास्ते खुले हैं, जिस से कभी बाढ आती हैं तो कभी सूखा पड़ता है।

किसी भी देश के जल की खपत का स्तर और तरीका वहाँ के आर्थिक विकास के स्तर का एक महत्वपूर्ण सूचक है। विकासशील देशों के लोग, विकसित देशों के लोगों से काफी कम प्रति व्यक्ति जल खर्च करते हैं। इस के अतिरिक्त, विकासशील देशों में जल संसाधनों का अधिकतर भाग कृषि पर खर्च होता है जबकि विकसित देशों में पानी का उपयोग कृषि और उद्योग में लगभग बराबर वितरित रहता है आर्थिक विकास से समाज की जीवन शैली में परिवर्तन आता है – यानी शहरीकरण, पाईपों द्वारा पानी की पहुँच, अनाज/माँस की खपत में वृद्धि, अधिक औद्योगीकरण – यानि कि हर ऐसी चीज़ जिस से पानी की खपत पर सीधा असर पड़े। अमरीका में औसत प्रति परिवार जल-खपत 1900 में 10 घन मीटर से बढ़ कर 2000 में 200 घन मीटर तक पहुँच गई, क्योंकि अधिकाधिक लोगों के लिए जल का स्रोत कुओं और सार्वजनिक नलों से बदल कर घरों के नल हो गए।

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