सोमवार, 19 जुलाई 2010

राइट टु एजुकेशनः अभी चुनौतियां हैं तमाम

राइट टु एजुकेशन कानून लागू तो हो गया लेकिन अभी इसके सामने कई जमीनी चुनौतियां हैं। इस कानून को व्यवहारिकता के धरातल पर उतारने में लंबा वक्त लग सकता है।
* नेबरहुड स्कूलों की परिकल्पना साकार करने के लिए बड़ी संख्या में नए स्कूल खोलने होंगे। इसके लिए भूखंड तय करने होंगे। शहरों के मास्टर प्लानों में बदलाव करना होगा। मौजूदा स्कूलों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया जाएगा। प्ले ग्राउंड और एजुकेशन की क्वॉलिटी सुधारनी होगी। ट्रांसपोर्ट सिस्टम डिवेलप करना होगा। यह काम रातों रात नहीं हो सकता।
* बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों , दोनों को अपना खजाना खोलना होगा। कुल खर्च का 55 प्रतिशत केंद्र और 45 प्रतिशत राज्य सरकारें देंगी। फिलहाल केंद्र ने 25,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। अगले पांच साल में इस पर एक लाख 71 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के खर्च का अनुमान है। इस रकम की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती है।
* केंद्र ने शिक्षा के अधिकार कानून को अमल में लाने के लिए मॉडल दिशानिर्देश तैयार किए हैं। अब हर राज्य और संघ शासित क्षेत्र उसके आधार पर अपने दिशानिर्देश तैयार करेंगे। इसमें महीने से ज्यादा समय लगेगा। राज्यों में अभी तो काम ही शुरू नहीं हुआ है।
* शिक्षा के अधिकार को जमीनी स्तर पर लाने के लिए पहले देश भर में प्राथमिक शिक्षा के मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। कानून में बच्चों को अपने घर से तीन किमी के दायरे में स्कूल देने का प्रावधान है। यदि स्कूल इससे दूर होगा तो बच्चों को लाने - ले जाने की मुफ्त व्यवस्था राज्य सरकारों को करनी होगी।
* नए स्कूल खोलने से पहले राज्य सरकारें स्थानीय निकायों की मदद से व्यापक सर्वे करके पता लगाएंगी कि किस क्षेत्र में 6-14 साल के कितने ऐसे बच्चे हैं , जो स्कूल नहीं जा रहे हैं। ये किस वर्ग के हैं। पिछड़े वर्ग के बच्चों की अलग लिस्ट बनेगी। इस सर्वे में कम से कम छह महीने लगेंगे।
* शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए बड़े स्तर पर प्राइमरी टीचरों की भर्ती होगी। अभी देश में कम से कम दो लाख से ज्यादा ट्रेंड टीचरों की कमी है। राज्य स्तर पर भर्ती की प्रक्रिया में कम से कम छह महीने लगेंगे। भर्ती की यह प्रक्रिया चरणबद्ध रूप से चलेगी।
* प्राइवेट स्कूलों को 25 पर्सेंट सीटें पिछड़े तबकों के बच्चों के लिए रिजर्व रखनी होंगी। राज्य सरकारें सरकारी स्कूल से तुलना कर इन बच्चों का खर्च देंगी। प्राइवेट स्कूलों का कहना है कि वे ज्यादा सुविधाएं देते हैं , इसलिए उन्हें पैसा दिया जाए। यह विवादास्पद मुद्दा है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें