मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

अभिनय में ट्रेनिंग से ज्यादा ऑबर्जवेशन की जरूरतः नंदीश संधू


ख्वाहिश बॉलीवुड में जाने की
कलर्स चैनल पर प्रसारित हो रहे सीरियल 'उतरन' में 'वीर' की भूमिका निभाने वाले नंदीश संधू अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच खास पहचान बन ली है। उनकी कामयाबी में उनकी क़ड़ी मेहनत के साथ-साथ किस्मत का भी ब़ड़ा योगदान है। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश...

अपने बारे में कुछ बताइए?
मैं राजस्थान के धौलपुर से हूं और दस साल पहले प़ढ़ाई करने के लिए मुंबई आया था। बचपन से ही मेरी ख्वाहिश एक्टिंग में आने की थी, लेकिन धौलपुर में रहते हुए यह ख्वाहिश को पूरा कर पाना मुश्किल था।
टीवी सीरियल में कैसे आना हुआ?
प़ढ़ाई खत्म होते ही मैंने मॉडलिंग में किस्मत आजमाना शुरू कर दिया। दो साल तक मॉडलिंग करने के साथ ही मैंने सीरियल के लिए ऑडिशन देने शुरू कर दिए। इस दौरान मुझे एकता कपूर के सीरियल कयामत के लिए चुन लिया गया।
एक्टिंग के लिए ट्रेनिंग का कितना महत्व है?
मैंने एक्टिंग की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली है। यदि आपका ऑबर्जवेशन अच्छा है तो आप अने सह कलाकारों के साथ काम करते हुए भी सीख सकते हैं। एक्टिंग के लिए किसी तरह की ट्रेनिंग को मैं जरूरी नहीं समझता।
आपका पहला सीरियल कौन सा था? मैंने कॅरिअर की शुस्र्आत बालाजी के सीरियल कयामत से की थी। इसके बाद 'ख्वाहिश' और 'हम ल़ड़कियां' सीरियल में भी मुझे महत्वपूर्ण किरदार की भूमिका मिली।
क्या आप बॉलीवुड में जाना पसंद करेंगे? वैसे मैं फिलहाल सीरियल में इतना व्यस्त हूं कि आगे कुछ सोच नहीं पाता, लेकिन यदि फिल्मों में जाने का मौका मिला तो जरूर जाऊंगा, मेरी भी इच्छा है कि मैं फिल्मों में काम करूं।
तपस्या और इच्छा के साथ काम करने का अनुभव के बारे में बताइए?उतरन में तपस्या का किरदार निभा रही रश्मी देसाई और इच्छा का किरदार निभा रहीं टीना दत्ता दोनों की एक्टिंग की तारीफ सभी कर रहे हैं। उतरन के सभी कलाकार अपना किरदार अच्छे से निभा रहे हैं तभी तो उतरन कलर्स का नंबर वन सीरियल बन चुका है, दर्शक इसे पसंद कर रहे हैं।
कॅरिअर के लिए आपको कितना संघर्ष करना प़ड़?प़ढ़ाई के दौरान मैंने मुंबई की ताज होटल में काम किया, लोगों की जूठी प्लेटें उठाईं। मॉडलिंग के साथ ही सीरियल में काम करने की लिए मेहनत की। फिर भी मैं इस मामले में बहुत लकी हूं, ज्यादा स्ट्रगल नहीं करनी प़ड़ी और आसानी से काम मिल गया।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

भारत में पानी से जुड़े मुद्दे

भारत में जल के दो मुख्य स्रोत हैं – वर्षा और हिमालय के ग्लेशियरों का हिम-पिघलाव। भारत में वार्षिक वर्षा 1170 मिलीमीटर होती है, जिस से यह संसार के सब से अधिक वर्षा वाले देशों में आता है। परन्तु, यहाँ एक ऋतु से दूसरी ऋतु में, और एक जगह से दूसरी जगह पर, होने वाली वर्षा में बहुत अधिक अन्तर हो जाता है। जहाँ एक सिरे पर उत्तरपूर्व में चेरापूँजी है, जहाँ हर साल 11000 मिलीमीटर बौछार होती है, वहीं दूसरे सिरे पर पश्चिम में जैसलमेर जैसी जगहें हैं जहाँ मुश्किल से 200 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है। राजस्थान के लोगों को यह यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि गुजरात में इस मानसून की बाढ़ में 2000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ या फिर कि हिमाचल की सतलज नदी की बाँध से हज़ारों लोग बेघर हो गये या यह कि हाल की बहुवर्षा से मुंबई का जनजीवन ही अस्तव्यस्त हो गया।

शहरी दरिद्र के लिये शुद्ध पेयजल अभी भी स्वप्न मात्र है। हालांकि बर्फ व ग्लेशियर ताजे पानी के इतने अच्छे उत्पादक नहीं हैं, पर वे इसे बांटने के अच्छे साधन हैं व जरुरत के समय पानी देते हैं, जैसे कि गर्मी में। भारत में 80 प्रतिशत नदियों का प्रवाह गर्मियों के जून से लेकर सितम्बर तक के चार महीनों मे होता है जबकि गर्मी व उमस से भरी समुद्री हवा उत्तर पूर्व से अंदर की ओर आती है (दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम)। पानी की कमी भारत में बड़ी तेजी से भयानक रूप लेती जा रही है। विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार, जब जनसंख्या 2025 में बढ़कर 140 करोड़ हो जाएगी, पानी की बढ़ी हुई जरुरत को पूरा करने के लिए देश की सभी जल स्त्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा।

बढ़ती आबादी का दबाव, आर्थिक विकास और नाकारा सरकारी नीतियों ने जल स्त्रोतों के अत्याधिक प्रयोग तथा प्रदूषण को बढ़ावा दिया है। पुनर्भरण से दुगनी दर पर ज़मीनी पानी बाहर निकाला जा रहा है जिससे कि जलस्तर हर साल 1 से 3 मीटर नीचे गिर जाता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की बीस बड़ी नदियों में से पाँच का नदी बेसिन पानी की कमी के मानक 1000 घन मीटर प्रति वर्ष से कम है और अगले तीन दशकों में इस में पाँच और नदी बेसिन भी जूड़ेंगे।

जल प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है व जल के उपलब्ध साधनों पर और अधिक दबाव डालती है। जल मंत्रालय के अनुसार, भारत का 70% सतह जल व बढ़ते हूए जमीनी जल के भंडार जैविक, व जहरीले रसायनों से प्रदूषित हैं। वर्ल्ड वॉटर इंस्टिट्यूट के अनुसार गंगा नदी, जो कि अनेकों भारतीयों का मुख्य जल स्त्रोत है, में हर मिनट 11 लाख लीटर गंदा नाले का पानी गिराया जाता है। यूनेस्को द्वारा दी गई विश्व जल विकास रिपोर्ट में भारतीय पानी को दुनिया के सबसे प्रदूषित पानी में तीसरे स्थान पर रखा गया है।

हरित क्रांति

हरित क्रांति में तीन मुख्य कारक थे जिन्होंने भारत को अन्न निर्भर देश से दुनिया के सबसे बड़े कृषक देशों में बदल दिया
• कृषि योग्य भूमि में लगातार विस्तार
• चालू कृषि भूमि में दोहरी फसलें – जिस से कि हर साल एक की जगह दो बार उपज की कटाई होती थी
• आनुवंशिक विज्ञान द्वारा बेहतर बीजों का प्रयोग
हरित क्रांति से रिकार्ड तोड़ अन्न उत्पादन हुआ व प्रति यूनिट उपज भी बढ़ी। लेकिन इस से पर्यावरण पर बुरा असर भी पड़ा। कृषि-रसायनों पर आधारित खरपतवार नाशकों के प्रयोग ने आसपास के वातावरण व मानव स्वास्थ्य पर भी असर डाला है। सींचित भूमि के बढ़ावे से जमीन की लवणता में भी वृद्धि हुई है।

जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जिनमें सम्मिलित हैं – घरेलू सीवेज, कृषि एवं औद्योगिक अपशिष्ट। साठ- सत्तर के दशक की “हरित क्रांति” ने ढेरों पर्यावरणीय मुद्दों को जन्म दिया (देखें बॉक्सः हरित क्रांति)। कृषि कार्यों में बेतहाशा इस्तेमाल किए जा रहे कीटनाशकों तथा कृत्रिम खादों ने जल में घुल मिलकर जलचरों के जीवन तक पहुँच बना ली है तथा जल को उपयोग हेतु अयोग्य बना दिया है।

शहरी क्षेत्रों में जल प्रदूषण का प्रमुख कारण है नालियों का मलमूत्र युक्त गंदा पानी तथा उद्योगों का रसायन युक्त उत्सर्जन जो बह-बह कर नदियों में मिलता रहता है। हर साल करीब 5 करोड़ घन मीटर गैर-उपचारित शहरी नालों का गंदा पानी इन नदियों में बहाया जाता है जिससे भारत की सभी चौदह नदी तंत्र भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं। इसी तरह, औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा उत्सर्जित 55 अरब घन मीटर प्रदूषित जल में से 6.85 करोड़ घन मीटर स्थानीय नदियों में, बिना किसी पूर्व उपचार के, सीधे सीधे बहा दिया जाता है।

भारत के 80 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू जल प्रदाय तथा 45 प्रतिशत क्षेत्रों में कृषि कार्य हेतु भूगर्भ जल ही इस्तेमाल में आता है। भूगर्भ जल पर यह भारी-भरकम निर्भरता इसके प्राकृतिक स्रोतों को तेज़ी से ख़त्म कर रही है। राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश तथा दक्षिणी राज्यों में भूगर्भ जल स्तर में तेज़ी से गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत अभी अभूतपूर्व आर्थिक उत्थान के दौर से गुजर रहा है जो जल संकट को और भी गहरा करेगा। जैसे जैसे ग्रामीणों का पलायन शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ता जाएगा, घरेलू तथा उद्योगों की बढ़ती जरूरतों की वजह से जल स्रोतों पर और भी अधिक भार पड़ता जाएगा।


संघर्ष
जल संकट के कारण साझा जल स्रोतों पर विवाद और संघर्ष पैदा होने की आशंका निर्मूल नहीं है। कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों के बीच कावेरी जल विवाद इसका अप्रतिम उदाहरण है। दोनों ही राज्य सिंचाई हेतु कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं। मानसून अगर देरी से आता है या अवर्षा की स्थिति निर्मित होती है तो नदी के जल के उपयोग के लिए हर बार विवाद की स्थिति बन जाती है। यह विवाद स्थानीय कृषकों के विस्थापन से और अधिक तीव्र एवं जटिल हो गया है जो जीवनयापन के लिए कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं।

कृषि उपज के अस्वस्थ तौर तरीक़ों तथा प्रभावी-पारंपरिक वर्षा जल संग्रहण तंत्र के बेजा इस्तेमाल के कारण जल के लिए संघर्ष तीव्रतर होता जा रहा है। क्षुद्र वाणिज्यिक लाभों के लिए तंजावूर डेल्टा स्थित तमिलनाड़ु के बड़े किसान धान की तीन तीन फसलें लेते हैं जिसके पैदावार के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। कर्नाटक में मंद्या के किसान गन्ने की खेती करते हैं – जो एक कैश क्रॉप है पर जिसके लिए भी अतिरिक्त जल की आवश्यकता होती है।

हाल ही में पंजाब सरकार अपने उस वादे से मुकर गई जो व्यास नदी के जल को हरियाणा और राजस्थान के बीच साझा करने के लिए सतलज यमुना लिंक बनाया जाने के लिए दिया गया था। हालाकि हरियाणा के तटवर्ती इलाकों में व्यास नदी नहीं बहती है, परंतु यह नदी जल समझौता दरअसल 1976 में हरियाणा के पंजाब अलग होने से पहले का है, लिहाजा हरियाणा का भी इस पर हक है। पर, तब से ही पंजाब अपने गहन कृषि उपयोग के लिए उस जल पर अपना दावा जताता रहा है।

भारत तथा विश्व में अनेक जगहों पर कई नदियाँ दो या अधिक देशों में से होकर बहती हैं। इन नदियों के जल सर्वत्र विवादों से घिरे रहे हैं कि किस देश का कितना हक बनता है। आज की महती आवश्यकता यह है कि कृषि को तर्कसंगत बनाया जाए, जल वितरण न्याय संगत तरीके से किया जाए तथा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस जल प्रबंधन नीति लागू की जाए।


बहस निजीकरण की

जैसे जैसे जल संरक्षण की जरूरतें बढ़ती जाएगी, वैसे वैसे नीति निर्धारकों तथा उद्योगों के बीच निजीकरण पर बहसें नया रूप लेती रहेंगी। आज के विश्व में जहाँ व्यक्ति और समुदाय जल के लिए अपनी गांठ से खर्च कर रहा है, वहीं कृषि तथा उद्योगों को जल के लिए सिंचाई के लिए नहरों और टैक्स छूट इत्यादि के जरिए आर्थिक सहायता मुहैया किए जा रहे हैं। ऊपर से, शहरी क्षेत्रों की सार्वजनिक जल वितरण प्रणालियाँ बढ़ती जरूरतों, भ्रष्टाचार, जल चोरी और ढहते आधारिक संरचना के चलते असफल होती जा रही हैं।

पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक

दक्षिण अमेरिका के बोलिविया में जलवितरण का निजीकरण करने का नतीजा निकला पानी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, पानी पहुँच से परे हो गया। कोचाबंबा में जलवितरण के निजीकरण का ठेका बेकटेल नामक कंपनी को मिला। बेकटेल ने तुरंत कीमतें दोगुनी कर दीं और शुल्क आधारित परमिट के द्वारा घरों में वर्षाजल के संचयन पर भी रोक लगा दी। कंपनी के इन मनमाने कदमों को व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ा और अंततः बेकटेल को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद बेकटेल ने बोलिविआई सरकार पर ढाई करोड़ डालर का दावा ठोंक दिया, जो कंपनी का कथित विशुद्ध मुनाफा होता यदि उसे काम करने दिया जाता। जलसंसाधनों के निजीकरण की बहस जल को उपभोक्ता सामग्री बनाने के मुद्दे पर केंद्रित है और एक सीधी विचारधारा पर आधारित हैः यदि जल संचयन समय की पुकार है तो जल का मूल्य अदा करने की मजबूरी जलसंचयन को बढावा ही देगी। लेकिन बहस इतनी सीधी भी नही है। पहले तो, जलसंचयन से गरीब व्यक्ति, जो कि आहार श्रँखला के सिरे पर होते हैं, और अधिक जलसंचय करने को मजबूर होगा क्योकि पहले ही उसकी पानी तक पहुँच कम है और वह पानी का अधिक मूल्य वहन भी नही कर सकता। पानी का निजीकरण एकाधिकार को बढावा देगी क्योकि ढाँचागत लागत की वसूली में जल कंपनियों को समय लगेगा और इस दौरान उसके जल वितरण पर निवारक अधिकार रहेंगे। यह एकाधिकार कंपनियों को ग्राहकों से पानी की बढी कीमतें लेने की भी इजाज़त दे देगा (देखें बॉक्सः पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक)।

ऐसी हालत में जब कि पानी की कीमत समुदाय द्वारा ही वहन की जानी है, क्या निजी संस्थानों को पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन से लाभार्जन की अनुमति देनी चाहिए? तेजी से फैलते वैश्वीकरण में जल का व्यवसायीकरण उसे उन लोगों से छीन लेगा जो कीमत वहन नही कर सकते।


नदियो का युगमन – चमत्कार या मृगमरीचिका?

पिछले कुछ वर्षों में नदियों को जोड़ने की योजना को खासा समर्थन मिला है। भारत में 37 नदियों को तीस कड़ियों, दर्जनों बाँधों और हजारों मील लंबी नहरों द्वारा जोड़ना 10,000 करोड़ रूपये का एक भागीरथ प्रयास होगा। इस योजना के मुख्य उद्देश्य हैं:

• 340 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई
• ग्रामीण, शहरी और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिये पेयजल।
• जलविद्युत जनरेटरों द्वारा 34000 मेगावाट का उत्पादन।
• नदीयों के नेटवर्क पर अन्तर्देशीय परिवहन
• पर्यावरण सुधार और वनीकरण का विकास
• रोजगार सृजन
• राष्ट्रीय एकता
यद्यपि इनमें कुछ उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं पर जनता एवं गैरसरकारी संगठनों द्वारा कुछ सवालिया निशान भी लगाये गये हैं। भाजपा सर्मथित एन.डी.ए सरकार द्वारा प्रारंभ की गई इस परियोजना का कॉग्रेस सर्मथित यू.पी.ए सरकार के नेतृत्व मे क्या हश्र होता है यह भी अस्पष्ट है। सरकारी दावा है कि नदियों को जोड़ने वाली आठ नहरों के तकनीकी औचित्य अध्ययन पूरे कर लिए गए हैं, फिर भी इन रिपोर्टों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे दस्तावेज़ों तक पहुँच न हो तो स्वतन्त्र संगठनों द्वारा सरकार के दावों की पुष्टि कठिन हो जाती है। उदाहरणतः यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना से उत्पन्न कितनी ऊर्जा खुद परियोजना को चलाने में खर्च होगी ताकि पानी को अधिक ऊँचाई तक उठाया जाए। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या रिसती नहरों को ठीक करने और सिंचाई की क्षमता को सुधारने जैसे वैकल्पिक समाधानों को भी मद्दे नज़र रखा जा रहा है अथवा नहीं।

क्या बाँध एक समाधान हैं?

बीसवीं सदी गवाह रहा ढेरों बड़े बाँधों के निर्माण का। आज विश्व में करीब 48000 बाँध हैं जो बढती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ती कर रहे हैं। संप्रति भारत व चीन विश्व के बड़े बाँध निर्माताओं में शामिल हैं। पर विरले ही ऐसे शोध किये गये जिससे यह पता लगे कि क्या बाँध उन उद्देश्यों की पूर्ती कर भी रहे हैं या नहीं, जिनके लिए उनका निर्माण हुआ।

पिछले दशक में वर्ल्ड कमिशन आन डैम्स (बाँध पर वैश्विक आयोग), जिसमें उद्योगपति, अभियंता, नीति निर्धारक और गैरसरकारी संगठन शामिल होते हैं, द्वारा बाँधो की लागत और उनसे लाभ के मूल्याकँन पर शोध किया गया। उनके शोध से यह साबित हुआ कि भले ही फायदे हुए हों, पर बाँधों के निर्माण कि लागत उनसे होने वालो लाभों से कहीं ज्यादा है। आयोग की सलाह थी कि बाँधों का निर्माण विकल्पहीनता की स्थिति में ही करना चाहिए।

बहुत से आदिवासी, किसान और मछुआरे नदियों के किनारों पर रहते हैं और अपनी जीविका के लिए नदियों पर निर्भर रहते हैं। अनुमान है कि भारत में 1950 से बने बाँधों के कारण पहले ही 2 करोड़ लोग विस्थापित हो गए हैं। बाँधों की आयु 30 से 50 साल रहती है। आजकल पश्चिम में पर्यावरण को हुई हानि के चलते बाँधों को तोड़ा जा रहा है। बाँधों के निर्माण से जंगल कट गए हैं, हज़ारों ऐसे वनप्राणियों और वृक्षों, जो बाढ़ को रोकने और पानी को ज़मीन में सोखने में मदद करते, का सफाया हो गया है। प्रसिद्ध भाखड़ा नांगल परियोजना के हाल के विश्लेषण से पता चला है कि इस बाँध से मिले पानी से पंजाब की सिंचाई की मांग की केवल 10% पूर्ति हुई है, और भूमिगत जल का घटाव राज्य में खतरनाक गति से जारी है।

प्रस्तावित जुड़ाव राज्यों के बीच बेहतर सहयोग की मांग करता है। परन्तु कई राज्यों ने जुड़ाव योजना को समर्थन देने से मना कर दिया है, क्योंकि उन्हें दूसरे राज्यों के साथ पानी बाँटना पड़ेगा। नदियों की घाटियाँ अन्तर्राष्ट्रीय जल निकाय हैं और उन पर अन्तर्राष्ट्रीय जल सन्धियाँ लागू होती हैं। भारत और उसके पड़ोसियों के बीच पानी के समुचित विभाजन पर कोई सहमति नहीं है।

विश्वव्यापी जल समस्याओं में निपुण सान्द्रा पोस्टेल के अनुसार, जल संरक्षण और वर्तमान संसाधनों का सक्षम प्रयोग आर्थिक और पर्यावरण-संबन्धी दृष्टि से, बाँध बनाने और पानी के वैकल्पिक स्रोत खोजने की अपेक्षा अधिक प्रभावी है। नदियों के पारस्परिक जुड़ाव और अन्य वैकल्पिक समाधानों के लाभ और लागत पर सार्वजनिक चर्चा को बहुत अधिक महत्ता दी जानी चाहिए, इस से पहले कि ज़्यादा देर हो जाए।


समाधान

वर्षाजल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) से राजस्थान के अलवर जिले में पिछले तीन साल से सूखे के प्रकोप से निजात पा रखी है।जहाँ चेरापूँजी, जिसे दुनिया के सब से वर्षायुक्त स्थान के रुप में जाना जाता है, जल की कमी से लगातार जूझ रहा है, राजस्थान का अलवर ज़िला, जहाँ वार्षिक वर्षा मात्र 300 मिलीमीटर होती है, असफल मानसून के रहते भी तीन साल से जल की दृष्टि से आत्मनिर्भर रहा है। यह तभी संभव हो पाया जब ऐसे जोहड़ बनाए गए और ठीक किये गए, जिन में मानसून के दौरान बारिश का पानी जमा किया जाता है, ताकि साल भर पानी दस्तियाब रहे। पानी के प्रयोग का नियन्त्रण सामुदायिक निर्णयों द्वारा किया जाता है और ऐसे कार्य वर्जित होते हैं जिन से जल-संवर्धन को हानि पहुँचती है, जैसे पशुओं को अत्यधिक चराना। जल संकट सिर पर होने के कारण ग्रामीण समुदाय ऐसे समाधानों की ओर रुख कर रहे हैं जो पारंपरिक रूप से भारत और अन्य स्थानों में प्रयोग होते रहे हैं। महाराष्ट्र में रालेगाँव सिद्धि से लेकर राजस्थान के अलवर ज़िले में और तमिलनाड़ के कई इलाकों में छोटे बाँध और तालाब ठीक किये जा रहे हैं ताकि स्थानीय जल समस्या को हल किया जाए।

जल संरक्षण के दस साधारण नियम

• हर दिन एक ऐसा काम करने का प्रयास करें जिससे जल बचाया जा सके। फिक्र न करें अगर यह कम है, हर बूँद की कीमत है। आप का कदम बदलाव ला सकता है।
• पानी उतना ही प्रयोग करें जितना ज़रूरत हो, जैसे कि दाढ़ी बनाते या ब्रश करते वक्त नल बंद कर दें।
• कोशिश करें कि आपके घर के अंदर व बाहर कहीं से पानी का रिसाव नहीं हो रहा हो।
• सब्ज़ी, दाल, चावल को धोने में प्रयुक्त पानी फेंके नहीं। इसे फर्श साफ करने या पेड़ों को पानी देने के काम में लाया जा सकता है।
• अपनी गाड़ी धोते वक्त पाइप की जगह बाल्टी का प्रयोग करें।
• अपने समुदाय में समूह बनाये जो जल संरक्षण और वर्षा जल हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहन देता हो। अपने इलाके के लिये साधारण वर्षा जल हार्वेस्टिंग प्रणाली बनायें। छत के जल का संचय कर व छान कर घरेलू प्रयोग के लिये शुद्ध पानी पाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिये यह जालस्थल देखें।
• अपने शौचालय में लो-फ्लश या ड्यूअल फ्लश जैसे फ्लश उपकरण लगवा कर आप पानी बचा सकते हैं।
• नहाते वक्त शॉवर की जगह बाल्टी व मग का इस्तेमाल करें।
• अगर वाशिंग मशीन का प्रयोग करना ही है तो मशीन फुल लोड पर चलायें।
• दिन के सबसे ठंडे समय यानि प्रातः या सांयकाल अपने बगीचे में पानी डालें।

स्थानीय सरकारों ने, विशेषकर तमिलनाड़ और कर्नाटक में, शहरों की लगभग सभी वाणिज्यिक एवं घरेलू इमारतों में वर्षा का जल एकत्रित करने के लिए सार्वजनिक नीति बनाने पर ज़ोर दिया है, जैसा चेन्नई ने कर दिखाया है। परन्तु बढ़ती आबादी और पानी की खपत के कारण शहरी समुदाय की बढ़ती प्यास बुझाने में ये असफल रहे हैं। अन्य समाधान भी हैं, जिन्हें भारत के सन्दर्भ में कुछ सुधारा जा सकता है। जैसे कि कनाडा, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया व भारत ने अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए “ग्रे वॉटर रिसाइक्लिंग” का प्रयोग करना शुरू किया है।

देश में पानी की सबसे ज्यादा बरबादी कृषि क्षेत्र में होती है। जहाँ विश्व में कृषि दक्षता का प्रतिशत 70 प्रतिशत है वहीं भारत में यह केवल 35 प्रतिशत है। शेष पानी बह जाने, वाष्प में बदल जाने या वॉटर लॉगिंग के कारण बरबाद हो जाता है। सिंचाई तकनीक में सुधार लाने के लिये काफी आधुनिकीकरण हुआ है। ड्रिप तकनीक उनमें से एक है। सरकार को कम लागत वाली आधुनिक सिंचाई तरकीबों की खोज के लिये धन लगाकर गरीब तथा मार्जीनल किसानों की सहायता करनी चाहिये जो इन मंहगी तरकीबों का खर्च नहीं उठा सकते।

पानी की बढ़ती कमी के कारण जल संरक्षण को आज की जरूरत बना दिया है। घरेलू, कृषि तथा ओद्योगिक स्तर पर जलसंरक्षण को बढ़ावा देना चाहिये। इसका मतलब यही है कि हमें अपनी जीवन शैली तथा क्रॉप पैटर्न (फसल चक्र) का पुनरीक्षण करना होगा ताकि पानी की मांग की को सफलता पूर्वक पूरा किया जा सके।

विभिन्न प्रयोगकर्ताओं में पानी के उपयोग की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं का निर्धारण आवश्यक हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार घरेलू तथा सफाई संबंधी जरूरतों के लिये प्रति व्यक्ति प्रति दिन पचास लीटर पानी की आवश्यक होती है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या के बावजूद यह आवश्यकता विश्व में उपलब्ध ताजे पानी की मात्रा का केवल 1.5 प्रतिशत है। अत: न्यूनतम मूलभूत जरूरत को पूरा करने राजनैतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये नीति निर्धारकों, सामूहिक तथा कृषि/उद्योग क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं से अलाहदा परिप्रेक्ष्य की जरूरत है। क्या हम इस चुनौती का सामना कर सकते है?

2025 तक विश्व की आधी आबादी भीषण जलसंकट झेलने पर विवश होगी। क्या है इस संकट की जड़?

जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है, इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी। इस संकट की जड़ क्या है? इस से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि “सबके लिये पानी” का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके? प्रस्तुत है इन सारे विषयों और जल से जुड़े अन्य मुद्दों पर विहंगम दृष्टि डालता यह आलेख।

राजस्थान के शुष्क इलाकों में महिलाओं को रोज़ाना घरेलू ज़रूरत का पानी लाने के लिये तकरीबन 4 घंटे चलना पड़ता है।

• दिसंबर 2003 में कर्नाटक ने तमिलनाडू को ज्यादा पानी देने के उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जतायी।
• तमिलनाडू में समय पर पानी नहीं मिल पाने के कारण फसलें काल कवलित होती रहीं।
• मधुरंथगम के किसानों का विरोध है कि चैन्नई की ज़रूरतो को पूरा करने के लिये उनके जलाशय से पानी क्यों लिया जा रहा है।
• भारत व बांग्लादेश में सेंकड़ो लोग, आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायनों से प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं, वहीं बोतलबंद पानी का 800 करोड़ रुपयों का बाज़ार फलफूल रहा है।
• प्लाचीमाडा, केरल में पंचायत विरोध जताती है कोका कोला के संयंत्र पर, जो उनके प्राकृतिक संसाधनों का नाश कर रहा है, पर न्यायालय आदेश देता है कि कोक अपना उत्पादन शुरु कर सकता है और ग्रामसभा को लाईसेंस देना ही पड़ेगा।
यह सारे तथ्य भारत में दिन प्रतिदिन विकराल रूप धरते जलसंकट का रूप दिखाते हैं।
जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है। युनेस्को जल को मानवाधिकार का दर्जा देती है। पर आज दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास पेयजल उपलब्ध नहीं है। लगभग और 290 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य-रक्षा सुविधायें मुहैय्या नहीं हैं। पानी लाने की जुगत में लड़कियाँ पाठशाला जाने की सोचें भी तो कैसे!अनुमान है कि सन् 2015 तक विश्व की आधी आबादी विकट जल संकट झेलने को विवश होगी। इस संकट की जड़ क्या है? क्या घटते जल प्रदाय से जल संकट पैदा हो रहा है? इस संकट से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि सहस्त्राब्दी के अंत तक सबके लिये पानी का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके?
शुद्ध पेयजल पूर्ति व जुड़े खतरे

पृथ्वी पर मौजूद जलसंपदा का सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही शुद्ध जल का स्त्रोत है। इसका भी दो तिहाई हिस्सा ध्रुवीय हिमपिंडो, बर्फ की तहों और गहरे भूमिगत संग्रहों में कैद हैं। तो पूरी जलसंपदा के सिर्फ 0.5 प्रतिशत तक ही मानव की सहज पहुँच है। यह शुद्ध जलापूर्ति विभिन्न रुपों में अभिगम्य है। जल चक्र जल का एक से अन्य रूप में रूपांतरण करता है (देखें बॉक्सः जल चक्र), जिससे सतही तथा भूमिगत जल स्त्रोतों की वर्षा तथा पिघलते हिमपिंडो से प्राप्त जल से पुनर्भरण होता है। पर यह जानना ज़रूरी है कि अगर वर्षाजल तथा सतही जल की सही तरीके से हार्वेस्टिंग न हो तो अधिकांश जल भूगर्भीय एक्यूफर्स (पानी का संचय करने वाली पत्थरों और मिट्टी की भूगर्भीय सतह) का पुनर्भरण करने के बजाय समुद्र के हत्थे चढ़ जायेगा।

स्वच्छ जल की आपूर्ति तकरीबन 7400 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यानि लगभग 4500 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन होती है। इससे आपको ऐसा लगता होगा कि यह तो ज़रूरत से भी ज्यादा है, पर लगातार बढ़ती मांग और घटती सप्लाई से वैश्विक जल प्रबंधन में कई परेशानियाँ हैं। ताज़े पानी के संसाधन विश्व में असमान रूप से फैले हुए हैं। उदाहरणतः एशिया में, जहाँ संसार की 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, विश्व के केवल 36 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इस असमान विभाजन से जल प्रबन्धन पर दो तरह से असर होता है: पहला, प्रति व्यक्ति जल की मात्रा घट जाती है, जिस का अर्थ है पानी की तंगी और कुछ इलाकों में संकट की स्थिति; और दूसरा, भूमिगत जल के दुरुपयोग से भविष्य में नवीकरण योग्य पानी तक हमारी पहुंच को और हानि पहुंचती है।
विश्व भर के जल का 80 प्रतिशत कृषि के लिए प्रयुक्ती होता है। परन्तु सिंचाई के लिए प्रयोग होने वाले जल का 60 प्रतिशत व्यर्थ जाता है, रिसती नहरों, वाष्पीकरण और कुप्रबन्धन के कारण। कृषि में प्रयोग हुए खाद और कीटनाशकों के अवशेष भी जल स्रोतों को दूषित करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं।
जल चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे शुद्ध जल का सतत पुनर्भरण होती रहती है।
• महासागर का जल वाश्पिकृत (evaporate) हो वाष्प का रूप धरता है।
• वाष्प का द्रविभवन (condensation) होता है और ये बादल का रूप धर लेते हैं।
• ठंडी ज़मीनी हवा के संपर्क में आकर जल पातन क्रिया (precipitation) के नतीजतन बारिश या हिम के रूप में गिरती है।
• वर्षा जल
o पौधों और वृक्षों के द्वारा प्रस्वादन से वाष्प में बदलता है।
o ज़मीन मे समाता है और भूमिगत जल, नदियों तथा महासागर की ओर बहने लगता है।
o पृथ्वी की सतह पर जलधारा के रूप मे बह कर महासागर में मिल जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक, मानवीय और कृषि-सम्बन्धित जूठन के रूप में 20 लाख टन गन्दगी और विषाक्त जल हमारे पानी में मिल जाता है। इस गन्दगी और विषाक्त पदार्थों से ताज़े जल की उपलब्धि 58 प्रतिशत तक घटने का डर है। इस के अतिरिक्त प्रदूषण से होने वाले नाटकीय जलवायु परिवर्तन से भी जल की उपलब्धि 20 प्रतिशत घटने की आशंका है। पानी के बढ़ते उपभोग और बढ़ते शहरीकरण के कारण पानी का संकट और भीषण होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के परिणामस्वरूप भूमिगत जल का भी संसार के अनेक शहरों में ज़रूरत से ज़्यादा दोहन हो रहा है (देखें बॉक्सः एक धंसता शहर)। भूमिगत जल के दुरुपयोग से भूमि भी सिकुड़ रही है और हम जल संग्रहण के सबसे सस्ते पात्र से भी हाथ धोने जा रहे हैं। जलस्रोतों के संरक्षण और शुद्धिकरण में वन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रदूषण करने वाले तत्वों को नदियों तक पहुँचने से रोकते हैं, बाढ़ रोकते हैं और भूमिगत जल के पुनर्भरण में वृद्धि करते हैं।

अनुमान है कि न्यूयॉर्क नगर में वितरित जल का 25 प्रतिशत भाग जंगल ही साफ करते हैं। शहरीकरण द्वारा वनों के कटाव और वेटलैंड्स (जलयुक्त भूमिक्षेत्र) के हनन से पानी के भटकने के रास्ते खुले हैं, जिस से कभी बाढ आती हैं तो कभी सूखा पड़ता है।

किसी भी देश के जल की खपत का स्तर और तरीका वहाँ के आर्थिक विकास के स्तर का एक महत्वपूर्ण सूचक है। विकासशील देशों के लोग, विकसित देशों के लोगों से काफी कम प्रति व्यक्ति जल खर्च करते हैं। इस के अतिरिक्त, विकासशील देशों में जल संसाधनों का अधिकतर भाग कृषि पर खर्च होता है जबकि विकसित देशों में पानी का उपयोग कृषि और उद्योग में लगभग बराबर वितरित रहता है आर्थिक विकास से समाज की जीवन शैली में परिवर्तन आता है – यानी शहरीकरण, पाईपों द्वारा पानी की पहुँच, अनाज/माँस की खपत में वृद्धि, अधिक औद्योगीकरण – यानि कि हर ऐसी चीज़ जिस से पानी की खपत पर सीधा असर पड़े। अमरीका में औसत प्रति परिवार जल-खपत 1900 में 10 घन मीटर से बढ़ कर 2000 में 200 घन मीटर तक पहुँच गई, क्योंकि अधिकाधिक लोगों के लिए जल का स्रोत कुओं और सार्वजनिक नलों से बदल कर घरों के नल हो गए।

रविवार, 14 नवंबर 2010

चाचा के देश में बचपन बेहाल

भारत में होती है सबसे ज्यादा शिशुओं की मौत
रायटर्स :
बच्चों से बेशुमार स्नेह रखने वाले चाचा नेहरू के देश में बचपन बेहाल है। दुनियाभर में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत सबसे ज्यादा भारत में होती है। इस तरह की मौत का मुख्य कारणघर पर बच्चा पैदा करने की व्यवस्था और मेडिकल सुविधाओं की कमी होना है। यह बात भारत में हुए एक शोध में सामने आई है। वह भी बाल दिवस से ठीक पहले। गौरतलब है कि जन्म देते समय महिलाओं की मौत के मामले भी सबसे ज्यादा भारत में पाए गए हैं। शनिवार को साइंस पत्रिका द लासेंट में प्रकाशित शोध में निमोनिया, अपरिपक्वता और जन्म के समय बच्चे का कम वजन, डायरिया, संक्रमण, दम घुटना और समय से पूर्व जन्म को बच्चों की मृत्यु का मुख्य कारण बताया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक बेहतर उपचार व्यवस्था और टीकाकरण कार्यक्रमों में नए टीकों को शामिल करके इन मौत के मामलों में कमी लाई जा सकती है। शोध का नेतृत्व रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया ने किया है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2005 में भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के 20 लाख 35 हजार बच्चों की मौत हुई थी। यह आंकड़ा विश्व में हुई शिशुओं की मौत का 20 प्रतिशत है। यानी सबसे ज्यादा भारत में। मृतक लड़कियों की संख्या लड़कों से 36 प्रतिशत अधिक थी। इसके लिए देश की सामाजिक परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया गया, क्योंकि यहां लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है।

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

वल्लभ भवन में मुख्यमंत्री और मंत्रियों को खतरा?

भोपाल। चौकिए नहीं, यह हम नहीं बल्कि सामान्य प्रशासन विभाग के जारी एक आदेश से इस आशय के संकेत मिलते हैं। जीएडी प्रमुख सचिव ने मंत्रालय स्थित सभी विभागों के मुखियाओं से निवेदन किया है कि आदेश का पालन सुनिश्चित कराया जाए। क्योंकि मंत्रालय में कैबिनेट के सदस्यों के कक्ष हैं और खतरा हो सकता है। जीएडी प्रमुख सचिव श्रीमती विजया श्रीवास्तव ने गत अट्ठाइस अक्टूबर को एक आशय का आदेश जारी किया है। आदेश में बताया गया है कि मंत्रालय में विभिन्न अधिकारियों के कक्षों में सुधार और रखरखाव का कार्य जारी है। कक्षों का सुधार कार्य विभिन्न एजेंसियों से कराया जा रहा है। इसके लिए एजेंसी के ठेकेदार और कारीगरों का मंत्रालय आना जाना होता है। जबकि इसके लिए आवास एवं पर्यावरण विभाग के अधीन एजेंसी राजधानी परियोजना प्रशासन अधिकृत है। मंत्रालय में अन्य एजेंसी से कक्षों की मरम्मत या सुधार कार्य नहीं कराया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त कक्षों से मरम्मत के दौरान निकाली गयी सामग्री मंत्रालय के गलियारों में अस्त-व्यस्त पड़ी रहती है। नियमानुसार अनुपयोगी सामग्री राजधानी परियोजना प्रशासन के सुपुर्द की जाना चाहिए जो नहीं हो रहा है।
सूत्र बताते हैं कि इस आदेश के नेपथ्य में जीएडी की कैबिनेट सदस्यों की सुरक्षा की चिंता समाहित है। बताया जाता है कि मंत्रालय में जिन विभिन्न एजेंसियों के द्वारा कक्षों का सुधार कार्य कराया जा रहा है वह तो कुछ हद तक ठीक है लेकिन सुधार कार्य में संलग् ठेकेदारों और कारीगरों की क्या पहचान है यह चिंता का विषय है। ठेकेदार और कारीगर सुधार कार्य के लिए पास का सहारा लेकर मंत्रालय में प्रवेश करते हैं। ठेकेदारों और कारीगरों का क्या रिकार्ड है किसी को पता नहीं रहता है। इस स्थिति में कैबिनेट सदस्यों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री के लिए तो सुरक्षा व्यवस्था मंत्रालय में हमेशा चॉक चौबंद रहती है लेकिन मंत्रियों के लिए मंत्रालय में सुरक्षा जरुरी है।

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

मंदिर तोड़ कर बनाई गई थी मस्जिदः हाई कोर्ट

तीन हिस्सों में बंटेगी विवादित जमीन
लखनऊ।। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि पर फैसला देते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड
का दावा खारिज कर दिया है। राम चबूतरा और गर्भ गृह दोनों निर्मोही अखाड़ा को दे दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ वकील रविशंकर प्रसाद ने बताया कि तीनों जजों ने अपने फैसले में कहा कि विवादित भूमि को तीन हि्स्सों में बांटा जाएगा। उसका एक हिस्सा (जहां राम लला की प्रतिमा विराजमान है हिंदुओं को मंदिर के लिए) दिया जाएगा। दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिया जाएगा और तीसरा हिस्सा मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाएगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच की जस्टिस डी. वी. शर्मा, जस्टिस एस. यू. खान और जस्टिस सुधीर अग्रवाल की बेंच ने इस मामले में अपना फैसला कोर्ट नंबर 21 में दोपहर 3.30 बजे से सुनाना शुरू कर दिया। मीडियाकर्मियों को अदालत जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। बाद में डीसी ऑफिस में बनाए गए मीडिया सेंटर में मीडियाकर्मियों को तीनों जजों के फैसलों की सिनॉप्सिस दी गई।
लखनऊ के डीएम अनिल कुमार सागर ने कहा कि मामले से सीधे तौर पर जुड़े लोगों को ही कोर्ट नंबर 21 में प्रवेश करने की इजाजत थी। जिन्हें प्रवेश दिया गया उन्हें फैसला सुनाए जाने से पहले कक्ष से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। डीआईजी राजीव कृष्ण ने कहा कि फैसले के बाद किसी तरह के विजय जुलूस या गम के प्रदर्शन के आयोजन पर पहले से ही पाबंदी लगी हुई है। अगर इस रोक के बावजूद ऐसी कोई कोशिश की गई तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट को 24 सितंबर को ही फैसला सुना देना था, लेकिन पूर्व नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को निर्णय एक हफ्ते के लिए टाल दिया था। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपाठी की अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद हाई कोर्ट के फैसले सुनाने का रास्ता साफ हुआ।.
अर्से पुराने मुद्दे का दोनों समुदायों के बीच बातचीत से कोई हल नहीं निकल सका। पूर्व प्रधानमंत्रियों- पी. वी. नरसिम्हा राव, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर ने भी इस मुद्दे के बातचीत से निपटारे की कोशिश की थी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।
हालांकि, उस जमीन पर विवाद तो मध्ययुग से चला आ रहा है लेकिन इसने कानूनी शक्ल वर्ष 1950 में ली। देश में गणतंत्र लागू होने से एक हफ्ते पहले 18 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने विवादित स्थल पर रखी गईं मूर्तियों की पूजा का अधिकार देने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
तब से चली आ रही इस कानूनी लड़ाई में बाद में हिन्दुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधि के तौर पर अनेक पक्षकार शामिल हुए। अदालत ने इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के सैकड़ों गवाहों का बयान लिया। अदालत में पेश हुए गवाहों में से 58 हिन्दू पक्ष के, जबकि 36 मुस्लिम पक्ष के हैं और उनके बयान 13 हजार पन्नों में दर्ज हुए।
हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई ) से विवादित स्थल के आसपास खुदाई करने के लिए कहा था। इसका मकसद यह पता लगाना था कि मस्जिद बनाए जाने से पहले उस जगह कोई मंदिर था या नहीं। हिंदुओं और मुसलमानों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में हुई खुदाई मार्च में शुरू होकर अगस्त तक चली।
इस विवाद की शुरुआत सदियों पहले सन् 1528 में मुगल शासक बाबर के उस स्थल पर एक मस्जिद बनवाने के साथ हुई थी। हिंदू समुदाय का दावा है कि वह स्थान भगवान राम का जन्मस्थल है और पूर्व में वहां मंदिर था। विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने वर्ष 1859 में दोनों समुदायों के पूजा स्थलों के बीच बाड़ लगा दी थी। इमारत के अंदर के हिस्से को मुसलमानों और बाहरी भाग को हिन्दुओं के इस्तेमाल के लिए निर्धारित किया गया था। यह व्यवस्था वर्ष 1949 में मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्ति रखे जाने तक चलती रही।
उसके बाद प्रशासन ने उस परिसर को विवादित स्थल घोषित करके उसके दरवाजे पर ताला लगवा दिया था। उसके 37 साल बाद एक याचिका पर वर्ष 1986 में फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज ने वह ताला खुलवा दिया था
समय गुजरने के साथ इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। वर्ष 1990 में वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या के लिए एक रथयात्रा निकाली, मगर उन्हें तब बिहार में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। केंद्र में उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी। 31 अक्टूबर 1990 को बड़ी संख्या में राम मंदिर समर्थक आंदोलनकारी अयोध्या में आ जुटे और पहली बार इस मुद्दे को लेकर तनाव, संघर्ष और हिंसा की घटनाएं हुईं।
सिलसिला आगे बढ़ा और 6 दिसम्बर 1992 को कार सेवा करने के लिए जुटी लाखों लोगों की उन्मादी भीड़ ने वीएचपी, शिव सेना और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। प्रतिक्रिया में प्रदेश और देश के कई भागों में हिंसा हुई, जिसमें लगभग दो हजार लोगों की जान गई। उस समय उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में पी. वी. नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कांग्रेस की सरकार थी।
हालांकि, इस बार अदालत का फैसला आने के समय वर्ष 1990 व 1992 की तरह कोई आंदोलन नहीं चल रहा था, बावजूद इसके सुरक्षा को लेकर सरकार की सख्त व्यवस्था के पीछे कहीं न कहीं उन मौकों पर पैदा हुई कठिन परिस्थितियों की याद से उपजी आशंका थी।
अयोध्या के विवादित स्थल पर स्वामित्व संबंधी पहला मुकदमा वर्ष 1950 में गोपाल सिंह विशारद की तरफ से दाखिल किया गया , जिसमें उन्होंने वहां रामलला की पूजा जारी रखने की अनुमति मांगी थी। दूसरा मुकदमा इसी साल 1950 में ही परमहंस रामचंद्र दास की तरफ से दाखिल किया गया , जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया। तीसरा मुकदमा 1959 में निर्मोही अखाडे़ की तरफ से दाखिल किया गया, जिसमें विवादित स्थल को निर्मोही अखाडे़ को सौंप देने की मांग की गई थी। चौथा मुकदमा 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल बोर्ड की तरफ से दाखिल हुआ और पांचवां मुकदमा भगवान श्रीरामलला विराजमान की तरफ से वर्ष 1989 में दाखिल किया गया। वर्ष 1989 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता की अर्जी पर चारों मुकदमे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में स्थानांतरित कर दिए गए थे।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

अयोध्‍या विवाद

अयोध्‍या में राम जन्‍मभूमि का इतिहास कई सदी पुराना है। उत्‍तर प्रदेश के अयोध्‍या का विवाद देश के हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण है। इसी के साथ देश की राजनीति को को भी प्रभावित करता रहा है. भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद जैसे भगवा संगठन इस विवादास्पद स्थल पर मंदिर बनाना चाहती है, जहाँ पहले मस्जिद थी. यहां जानिए की समय का पहिया कैसे-कैसे चला और इसी के साथ भारतीय राजनीति के साथ भारतीय समुदाय में भी क्‍या क्‍या बदलाव आया।
1528 : बात पांच सौ साल से भी अधिक पुरानी है। जब अयोध्या में एक मस्जिद का निर्माण किया गया लेकिन कुछ हिंदूओं को कहना था कि इसी जमीन पर भगवान राम का जन्‍म हुआ था। यह मस्जिद बाबर ने बनवाई थी जिसके कारण इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा। लेकिन कई इतिहासकारों का मानना है कि बाबर कभी अयोध्‍या गया ही नहीं।

1853 : मस्जिद के निर्माण के करीब तीन सौ साल बाद पहली बार इस स्‍थान के पास दंगे हुए.

1859 : ब्रिटिश सरकार ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की इजाजत दी।

1949 : भगवान राम की मूर्तियां कथित तौर पर मस्जिद में पाई गयीं. माना जाता है कि कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाईं थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया। जिसके बाद मामला कोर्ट में गया। जिसके बाद सरकार ने स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया.

1984 : विश्व हिंदू परिषद ने इस विवादित स्‍थल पर राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. जिसका नेतृत्व बाद में भाजपा के के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने किया।

1992 : भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और शिव सेना के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया। जिसके बाद पूरे देश में हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगे भड़क उठे। दो हजार से भी अधिक लोगों की इसमें जान गई।

2001 : बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर पूरे देश में तनाव बढ़ गया और जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने के अपना संकल्प दोहराया।

फ़रवरी 2002 : भाजपा की अपनी गलती का अहसास। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.

13 मार्च, 2002 : सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.

15 मार्च, 2002 : विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं।

22 जून, 2002 : विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई।

जनवरी 2003 : रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला।

मार्च 2003 : केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया।

अप्रैल 2003 : इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला।

मई 2003 : सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए।

जून 2003 : काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अगस्त 2003 : भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए।

अप्रैल 2004 : आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण ज़रूर किया जाएगा।

जनवरी 2005 : लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी भूमिका के मामले में अदालत में तलब किया गया।

जुलाई 2005 : पाँच हथियारबंद आतंकवादियों ने विवादित परिसर पर हमला किया। इसमें पाँचों समेत सहित छह लोग मारे गए।

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में रायबरेली की अदालत में पेश। अदालत में लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय।

20 अप्रैल 2006 : यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना के शामिल।.

जुलाई 2006 : सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ़ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया. मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया।

30 जून 2009 : बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी।

23 नवंबर 2009 : एक अंग्रेजी अखबार में आयोग की रिपोर्ट लीक, संसद में हंगामा।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

महिला हॉकी टीम में सेक्स स्कैंडल

बाइलाइन इंडिया. भारतीय महिला हॉकी टीम में सेक्स स्कैंडल का मामला उजागर होने के बाद सनसनी फैल गई है। सूत्रों के मुताबिक टीम की एक सदस्य ने टीम के कोच और पूर्व ओलंपियन महाराज किशन कौशिक पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। खेल मंत्रालय को पीडिता द्वारा लिखे गए पत्र में कोच पर यह आरोप लगाया गया है। इन आरोपो के बाद कोच को फिलहाल पद से हटा दिया गया है और मामले की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन कर दिया गया है। इस समिति में पूर्व कप्तान अजीतपाल सिंह, जफर इकबाल, राजीव मेहता और सुदर्शन पाठक को शामिल किया गया है।
11 जून के इस पत्र के अनुसार खिलाडियों ने आरोप लगाया है कि "कौशिक ने जूनियर लड़कियों से सेक्स संबंध बनाने को कहा और भद्दी टिप्पणियां करते हुए मैच से पहले होने वाली बैठक में उन्हें अपने कमरे में बुलाया। गरीब और अच्छे परिवारों से आई ये लड़कियां कोच के खिलाफ मुंह खोलने से बेहद डरी हुई थीं। दो साल पहले भी कोच के स्टाफ की महिला से भी अवैध संबंध रह चुके हैं। इन दोनों ने महिला हॉकी टीम के कैंप के माहौल को पूरी तरह से खराब कर दिया है। कैंप उनके बीच होने वाली घिनौनी करतूतों का अंग बन गया है।"
हालांकि, आरोपी कोच कौशिक ने इन आरोपों का सिरे से खारिज कर दिया है। कौशिक ने कहा कि मैं नहीं जानता यह पत्र किसने लिखा है लेकिन मैं खेल मंत्रालय से गुजारिश करूंगा कि इस मामले की पूरी जांच हो और जिसने मुझे बदनाम करने की कोशिश की है उसे कड़ी सजा दी जाए।
खिलाडियों द्वारा मंत्रालय को भेजे गए पत्र में महिला हॉकी टीम के वीडियोग्राफर पर भी अपने कमरे में कॉल गर्ल बुलाने का आरोप लगाया गया है। इसमें लिखा गया कि "टीम में दो विडियोग्राफर हैं जिन्हें स्पोर्टस अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने नियुक्त किया है। इनमेें से एक हैं बसवराज जिन्हें कंप्यूटर्स का कतई ज्ञान नहीं है बस वो मैच को रिकॉर्ड करना जानते हैं। जबकि दूसरी सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल एच नलिनी हैं। लेकिन कौशिक किसी भी विदेश दौरे पर बसवराज को टीम के साथ ले जाते थे।
इसके पीछे का कारण था कि बसवराज कौशिक को घूस देता था साथ ही उसके लिए शराब का इंतजाम करता था। पूरी टीम इन सबसे परेशान थी।" खिलाडियों ने आखिर में इस पूरे मामले की जांच की मांग करते हुए कहा कि कौशिक मनोवैज्ञाकि रूप से फिट नहीं है। आखिर में पत्र में लिखा गया कि भारतीय टीम कोच के कारण अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही है।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

कर्नाटक में हैं स्कूलों से ज्यादा मंदिर

बेंगलुरुः ऐसा लगता है कि कर्नाटक के रहने वाले, खासतौर पर बेंगलुरु के निवासी काफी धार्मिक हैं। पूरे राज
्य में दो लाख से भी ज्यादा पूजा स्थल हैं, जिनमें 5,739 अकेले बेंगलुरु में ही स्थित हैं।
2001 की जनगणना के मुताबिक शिक्षा संस्थानों (1.16 लाख) और हॉस्पिटलों (38,380) की कुल संख्या भी धार्मिक स्थलों से काफी कम है। आंकड़ों के हिसाब से पूरे राज्य में 2.07 लाख धार्मिक स्थल हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहां हर 263 लोगों के लिए एक पूजा स्थल है, जबकि हर 455 लोगों के लिए एक स्कूल/कॉलेज और हर 1,375 व्यक्तियों के लिए एक हॉस्पिटल या डिस्पेंसरी है।
15,000 पूजा स्थलों से ज्यादा होने की वजह से बेलगाम, गुलबर्गा और बेंगलुरु पूरे राज्य में क्रमश: पहले तीन स्थानों पर हैं। इनके अलावा चार और जिलों- तमकुर, कोलार, दक्षिण कन्नड़ा और बीजापुर में 10 हजार से ज्यादा धर्म स्थल हैं। क्षमाराजनगर में 2,912 और कोडागु में सबसे कम 1,756 पूजा स्थल हैं। राज्य के शहरों और कस्बों में बेंगलुरु (वृहत बेंगलुरु महानगर पालिका इलाका) 5,739 धार्मिक स्थलों समेत पहले नंबर पर है। हुबली-धारवाड़ 1,429 और मेंगलूर 1,268 पूजा स्थलों समेत दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं।

राइट टु एजुकेशनः अभी चुनौतियां हैं तमाम

राइट टु एजुकेशन कानून लागू तो हो गया लेकिन अभी इसके सामने कई जमीनी चुनौतियां हैं। इस कानून को व्यवहारिकता के धरातल पर उतारने में लंबा वक्त लग सकता है।
* नेबरहुड स्कूलों की परिकल्पना साकार करने के लिए बड़ी संख्या में नए स्कूल खोलने होंगे। इसके लिए भूखंड तय करने होंगे। शहरों के मास्टर प्लानों में बदलाव करना होगा। मौजूदा स्कूलों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया जाएगा। प्ले ग्राउंड और एजुकेशन की क्वॉलिटी सुधारनी होगी। ट्रांसपोर्ट सिस्टम डिवेलप करना होगा। यह काम रातों रात नहीं हो सकता।
* बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों , दोनों को अपना खजाना खोलना होगा। कुल खर्च का 55 प्रतिशत केंद्र और 45 प्रतिशत राज्य सरकारें देंगी। फिलहाल केंद्र ने 25,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। अगले पांच साल में इस पर एक लाख 71 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के खर्च का अनुमान है। इस रकम की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती है।
* केंद्र ने शिक्षा के अधिकार कानून को अमल में लाने के लिए मॉडल दिशानिर्देश तैयार किए हैं। अब हर राज्य और संघ शासित क्षेत्र उसके आधार पर अपने दिशानिर्देश तैयार करेंगे। इसमें महीने से ज्यादा समय लगेगा। राज्यों में अभी तो काम ही शुरू नहीं हुआ है।
* शिक्षा के अधिकार को जमीनी स्तर पर लाने के लिए पहले देश भर में प्राथमिक शिक्षा के मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। कानून में बच्चों को अपने घर से तीन किमी के दायरे में स्कूल देने का प्रावधान है। यदि स्कूल इससे दूर होगा तो बच्चों को लाने - ले जाने की मुफ्त व्यवस्था राज्य सरकारों को करनी होगी।
* नए स्कूल खोलने से पहले राज्य सरकारें स्थानीय निकायों की मदद से व्यापक सर्वे करके पता लगाएंगी कि किस क्षेत्र में 6-14 साल के कितने ऐसे बच्चे हैं , जो स्कूल नहीं जा रहे हैं। ये किस वर्ग के हैं। पिछड़े वर्ग के बच्चों की अलग लिस्ट बनेगी। इस सर्वे में कम से कम छह महीने लगेंगे।
* शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए बड़े स्तर पर प्राइमरी टीचरों की भर्ती होगी। अभी देश में कम से कम दो लाख से ज्यादा ट्रेंड टीचरों की कमी है। राज्य स्तर पर भर्ती की प्रक्रिया में कम से कम छह महीने लगेंगे। भर्ती की यह प्रक्रिया चरणबद्ध रूप से चलेगी।
* प्राइवेट स्कूलों को 25 पर्सेंट सीटें पिछड़े तबकों के बच्चों के लिए रिजर्व रखनी होंगी। राज्य सरकारें सरकारी स्कूल से तुलना कर इन बच्चों का खर्च देंगी। प्राइवेट स्कूलों का कहना है कि वे ज्यादा सुविधाएं देते हैं , इसलिए उन्हें पैसा दिया जाए। यह विवादास्पद मुद्दा है।